रिसाली निगम क्षेत्र के पार्टी कार्यक्रमों के प्रभारी रहे पुत्र और पुत्र वधु..शायद किसी पर भरोसा न था,सदन में प्रतिनिधी भी बनाया तो पुत्र को किसी कार्यकर्ता को मौका नही दिया
दुर्ग ग्रामीण के एक मात्र नगर पंचायत उतई के नेताजी के पांच वर्षों के क्रियाकलापों पर नजर डालें तो बहुत कुछ ऐसा हुआ जिससे संगठन कमजोर हुआ, जिसका कारण था संगठन को भी अपने कब्जे में रखना, समर्पित किनारे लगा दिए गए किंतु नेताजी है की मौन धारण करे रहे,
पहले घटनाक्रम पर नजर डालें तो नगर पंचायत में एल्डरमैन की नियुक्ति का मामला है जिसमे तीन लोगों की नियुक्ति की गई पदुमलाल साहू,भोला कोसरिया ओर चंद्रहास वर्मा..इस नियुक्ति को जारी हुवे चौबीस घंटे भी नही हुवे थे की चहेतों की फरमाइश पर पदुम लाल साहू और भोला कोसरिया को तुरंत हटा दिया गया
और दो अन्य की नियुक्ति कर दी गई । कार्यकाल के दौरान ही एक एल्डरमैन के निधन के बाद खाली हुई सीट पर नगर के युवा थानसिंह गुरुपरख को एल्डरमेन नियुक्ति का लॉलीपॉप थमाया गया,सब उनको एल्डरमैन भी कहने लगे ,
किंतु चुनाव आ गए अब तक उनकी नियुक्ति नही की गई । प्रतिनिधि के रूप में भी वरिष्ठों को दरकिनार कर चापलूसों को नेता जी ने महत्व दिया ।बात यही तक आई गई नही थी ,नगर पंचायत अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव आया हालाकि प्रस्ताव ध्वस्त हो गया और अध्यक्ष की कुर्सी बच गई
किंतु कांग्रेस के कुल गिनती के पार्षदों मे संख्या कम हो गई ।इस घटनाक्रम में नगर पंचायत के उपाध्यक्ष और पीआईसी में शामिल दो प्रभारी और दो अन्य पार्षदों पर पार्टी के साथ धोखा करने का आरोप लगा उन्हे पीआईसी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और डेढ साल तक इस सारे मामले में भी नेताजी ने चुप्पी साधे रखी।
शायद उन्हें किसी की जरूरत नही थी किंतु चुनाव आते ही सारे मिजाज बदलने लगे और जो मौन रहते थे उनके मुंह से शहद झरने लगे ,घर बुलाकर नेताजी ने समझाया और सहयोग करने को कहा। यह विषय सिर्फ नगर पंचायत तक का नही है ऐसा ही बड़ा घटनाक्रम एक मात्र रिसाली निगम में भी आजतक होता आया है ,
एमआईसी के कुछ को साथ लेकर चलना और बाकी को किनारे लगा देना ,अपने चहेतों को एल्डरमैन की नियुक्ति और ठेकों में महत्व देकर आगे बढ़ाना और पार्टी के पुराने वरिष्ठों को यहां भी किनारे लगाने की उसी परंपरा का निर्वहन नेता जी ने रिसाली निगम क्षेत्र में भी किया ,
हर आयोजनों में चाहे वो हाथ से हाथ जोड़ो अभियान हो या भरोसा यात्रा प्रभारी बनाने की बात आई तो बेटा बहु को नेता जी ने आगे किया ।मतलब साफ था नेता जी को शायद किसी कार्यकर्ता पर कोई भरोसा नहीं था इसलिए उन्होंने हमेशा ही अपने परिवार को आगे किया और परिवार पर ही भरोसा जताया।
निगम में विधायक प्रतिनिधि नियुक्ति में भी उन्हे कोई दिखाई नही दिया उन्होंने अपने पुत्र को ही अपना प्रतिनिधि बनाया ताकि वो निगम सरकार पर नजर रखे और सब कुछ अपने हिसाब से उनके हिसाब से मैनेज कर सके यहां भी उनका किसी पर कोई भरोसा शायद कभी नही रहा ?
भरोसा की बात कर नेता जी ने कभी भी किसी समर्पित कार्यकर्ता और वरिष्ठों पर भरोसा ही नहीं किया अब विषय यह है की चुनाव आते ही सब कुछ उल्टा और नेता जी भी बदले बदले से नजर आने लगे हैं यह बदलाव भी शायद 17 नवम्बर के मतदान अथवा 03 दिसंबर गिनती तक के लिए ही आया है।
ऐसा प्रतित होता है ? जिसे समझने सोचने और फैसला लेने की जरूरत है ।लगभग ग्रामीण क्षेत्र में भी यही हाल है सब कुछ एक पर तीन फ्री की स्कीम पर ही पूरे कार्यकाल चलता रहा किंतु चाह कर भी किसी ने मुंह खोलकर सच्चाई बयान करने की हिम्मत नही दिखाई ।
ना जाने ऐसे लोगों ने और कौन सी बड़ी महत्वकांक्षा पाल रखी है जो अब नेताजी पूर्ण कर देंगे और इसी के चलते गलत को गलत बोलने की हिम्मत दिखा पाने में असमर्थ कार्यकर्ता मुंह बंद कर पीछे पीछे चलने को मजबूर रहे।
यह सब समझने और दुबारा धोखा खाने से बचने की जरूरत एक एक कार्यकर्ता और एक एक मतदाता है।खूब गहराई तक सोचने और फिर अपने व अपने परिवार की युवा पीढ़ी का भविष्य सोच समझकर मतदान करने की जरूरत है।

